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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीय़ो मे महामुनिः |  ४   क
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जय़ं जय़तां वरम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति