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विराट पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवसाय़ं स्वधर्मतः |  १४   क
यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति