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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गर्गं महाभागमृषय़ः सुव्रता नृप |  १७   क
उपासां चक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति