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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी |  १०९   क
उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ||  १०९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति