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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा मुनीन्दृष्ट्वा नानावेषधरान्वलः |  २७   क
आप्लुत्य सलिले चापि पूजय़ामास वै द्विजान् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति