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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसञ्चय़ान् |  ३२   क
प्राय़ात्प्राचीं दिशं राजन्दीप्यमानः स्वतेजसा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति