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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां हूय़मानैर्महात्मनाम् |  ४४   क
अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति