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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः |  ४६   क
नानानिय़मय़ुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशाय़िनः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति