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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
आसन्वै मुनय़स्तत्र सरस्वत्याः समीपतः |  ४७   क
शोभय़न्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति