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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कुञ्जान्वहून्दृष्ट्वा संनिवृत्तां च तां नदीम् |  ५५   क
वभूव विस्मय़स्तत्र रामस्याथ महात्मनः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति