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आदि पर्व
अध्याय ३७
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सूत उवाच
एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः |  १   क
मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति