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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
भुक्ताश्च विविधा भोगास्त्रिवर्गः सेवितो मय़ा |  २८   क
पितॄणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभय़ोः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति