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उद्योग पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
किं ते सुखप्रिय़ेणेह प्रोक्तेन भरतर्षभ |  १७   क
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथेच्छसि तथा कुरु |  १७   ख
न हि त्वामुत्सहे वक्तुं भूय़ो भरतसत्तम ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति