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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
एकस्यार्थे वहून्हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यथा |  ३१   क
स्वकर्मस्थान्विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति