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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
यद्भवान्मन्यते चापि शुभं वा यदि वाशुभम् |  ११   क
तद्वै कर्तास्मि कौरव्य वचनात्तव नान्यथा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति