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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तवत्यां गान्धार्यां कुन्ती व्रतकृशानना |  १५   क
प्रच्छन्नजातं पुत्रं तं सस्मारादित्यसम्भवम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति