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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कुन्ती श्वशुरय़ोः प्रणम्य शिरसा तदा |  १८   क
उवाच वाक्यं सव्रीडं विवृण्वाना पुरातनम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति