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सभा पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा ततश्चेदिपतिर्नृपः |  १५   क
भीष्मं रूक्षाक्षरा वाचः श्रावय़ामास भारत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति