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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः |  १४   क
तस्मात्त्यक्ष्यन्ति सङ्ग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति