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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपराय़णाः |  १५   क
अजेय़ाश्चेति मे वुद्धिरपि देवैः सवासवैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति