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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् |  ३२   क
तापसानां च शान्तानां भवेदुद्वेगकारकः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति