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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
मृगाणामुपय़ोगश्च वीरुदोषधिसङ्क्षय़ः |  ३३   क
विभर्षि हि वहून्विप्रान्वेदवेदाङ्गपारगान् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति