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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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हंस उवाच
नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य; मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी |  ६   क
न चातिमानी न च हीनवृत्तो; रूक्षां वाचं रुशतीं वर्जय़ीत ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति