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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्राजन्कञ्चित्कालं मनस्विनः |  ४०   क
धनुर्वेदपरा वीराः शृण्वाना वेदमुत्तमम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति