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विराट पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा क्लीववेषेण रथस्थं नरपुङ्गवम् |  १   क
शमीमभिमुखं यान्तं रथमारोप्य चोत्तरम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति