द्रोण पर्व  अध्याय १५६

वासुदेव उवाच

एकैको हि पृथक्तेषां समस्तां सुरवाहिनीम् |  ७   क
योधय़ेत्समरे पार्थ लोकपालाभिरक्षिताम् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति