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विराट पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
चलाश्च वाताः संवान्ति रूक्षाः परुषनिःस्वनाः |  ४   क
भस्मवर्णप्रकाशेन तमसा संवृतं नभः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति