द्रोण पर्व  अध्याय ९६

सञ्जय़ उवाच

ततः स रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम् |  ४०   क
आजघानाशु भल्लेन स हतो न्यपतद्भुवि ||  ४०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति