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विराट पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छाय़मिवाकाशं प्रकुर्वन्सर्वतः प्रभुः |  ६   क
प्रच्छादय़दमेय़ात्मा पार्थः शरशतैः कृपम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति