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द्रोण पर्व
अध्याय १४९
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सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च ततो राजन्दुर्योधनमिदं वचः |  ३५   क
एष ते निहतो वन्धुस्त्वय़ा दृष्टोऽस्य विक्रमः |  ३५   ख
पुनर्द्रष्टासि कर्णस्य निष्ठामेतां तथात्मनः ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति