वन पर्व  अध्याय २१७

मातर ऊचुः

भवेम सर्वलोकस्य वय़ं मातर उत्तमाः |  ७   क
प्रसादात्तव पूज्याश्च प्रिय़मेतत्कुरुष्व नः ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति