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उद्योग पर्व
अध्याय ३७
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विदुर उवाच
यो धर्ममर्थं कामं च यथाकालं निषेवते |  ४६   क
धर्मार्थकामसंय़ोगं सोऽमुत्रेह च विन्दति ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति