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उद्योग पर्व
अध्याय ३७
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विदुर उवाच
संनिय़च्छति यो वेगमुत्थितं क्रोधहर्षय़ोः |  ४७   क
स श्रिय़ो भाजनं राजन्यश्चापत्सु न मुह्यति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति