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मौसल पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्तेषामेरकां कश्चिज्जग्राह रुषितो नृप |  ३७   क
वज्रभूतेव सा राजन्नदृश्यत तदा विभो ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति