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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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युधिष्ठिर उवाच
संन्यस्यते यथात्माय़ं संन्यस्तात्मा यथा च यः |  २   क
परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे व्रूहि पितामह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति