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विराट पर्व
अध्याय १७
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द्रौपद्यु उवाच
सहस्रमृषय़ो यस्य नित्यमासन्सभासदः |  २०   क
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति