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द्रोण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तन्त सङ्क्रुद्धा विविधाय़ुधपाणय़ः |  १०   क
रथैरश्वैर्गजैश्चान्ये पादातैश्च वलोत्कटाः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति