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कर्ण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
ततः सा शुशुभे सेना निश्चेष्टावस्थिता नृप |  १०   क
नानापुष्पसमाकीर्णं यथा चैत्ररथं वनम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति