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कर्ण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
ततः क्रुद्धो रणे पार्थः संवृतस्तैर्महारथैः |  १५   क
निगृहीतं रथं दृष्ट्वा केशवं चाप्यभिद्रुतम् |  १५   ख
रथारूढांश्च सुवहून्पदातींश्चाप्यपातय़त् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति