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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद्विषेण वा |  २७   क
एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समय़ं हतः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति