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कर्ण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
यानुद्दिश्य रणे पार्थः पदवन्धं चकार ह |  २२   क
ते वद्धाः पदवन्धेन पाण्डवेन महात्मना |  २२   ख
निश्चेष्टा अभवन्राजन्नश्मसारमय़ा इव ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति