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कर्ण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे मुमुचुस्तं रथोत्तमम् |  २४   क
आय़ुधानि च सर्वाणि विस्रष्टुमुपचक्रमुः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति