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कर्ण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
संशप्तकास्तु समरे शरवृष्टिं समन्ततः |  ३   क
अपातय़न्पार्थमूर्ध्नि जय़गृद्धाः प्रमन्यवः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति