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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
तथा यान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् |  ९   क
अन्तरिक्षगता देवाः साधु साध्वित्यपूजय़न् |  ९   ख
वातिकाश्च नरा येऽत्र दृष्ट्वा ते हर्षमागताः ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति