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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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जनमेजय़ उवाच
सप्तसारस्वतं कस्मात्कश्च मङ्कणको मुनिः |  १   क
कथं सिद्धश्च भगवान्कश्चास्य निय़मोऽभवत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति