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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
महागिरौ वेणुवनं निशि प्रज्वलितं यथा |  १६   क
तथा तव महत्सैन्यं प्रास्फुरच्छरपीडितम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति