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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
औजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह |  १४४   क
कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  १४४   ख
सर्वपापविशुद्धात्मा कुरुलोकं प्रपद्यते ||  १४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति