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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
शृणु मङ्कणकस्यापि कौमारव्रह्मचारिणः |  २९   क
आपगामवगाढस्य राजन्प्रक्रीडितं महत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति