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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
राजन्सप्त सरस्वत्यो याभिर्व्याप्तमिदं जगत् |  ३   क
आहूता वलवद्भिर्हि तत्र तत्र सरस्वती ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति