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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा यदृच्छय़ा तत्र स्त्रिय़मम्भसि भारत |  ३०   क
स्नाय़न्तीं रुचिरापाङ्गीं दिग्वाससमनिन्दिताम् |  ३०   ख
सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति